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काश माँ कुछ काम करती।

मै एक conservative परिवार में पैदा हुआ, पला, बढ़ा।
मै बहोत छोटा था तबसे माँ को घर के काम मै देखता था।
पर हमारे आजुबाजु के लोगो को, घर के सदस्यों को माँ का काम, काम नहीं लगता था।
दादा दादी कहते थे, वो कहा कुछ करती है? दिन भर घर में ही तो रहती है।
सबने मिलके मुझे यही बताया था, माँ काम नहीं करती, घर पे ही होती है।
और ये सिर्फ मेरी माँ के लिए नहीं था सबकी माँ के लिये था।

मुझे जब ठीक से बोलना भी नहीं आता था तबसे यही सिखाया गया था।
औरतों की, उनके काम की, उनके सपनों की, उनकी इच्छाओं की कुछ कीमत थी ही नहीं।
आज जब मै खुद के घर में खुद का सारा काम करता हु तो महसूस करता हु,
सारा काम तो माँ ही करती थी।
और हम कितने कठोर थे की उसकी मदद करने की बजाय उसे कहते रहते थे
माँ कुछ काम ही नहीं करती।

पापा सुबह जल्दी उठकर काम पर निकल जाते है,
थके हारे, शाम को वापस आते है,
सब कहते हे, हमारा घर वही चलाते है,
माँ, वो कुछ नहीं करती,
बस सुबह पापा से पहले उठके टिफिन बनाती है,
और शाम को पापा के कपड़े धोती है,
काश माँ भी कुछ काम करती।
भैया भी अब बड़े हो रहे है,
कंप्यूटर इंजीनियर बनेंगे, ढेर सारा पैसा कमाएंगे,
पापा के काम में हाथ बटायेंगे
माँ, वो कुछ नहीं करती,
बस भैया की रूम साफ़ रखती है 
हर सुबह भैया के लिए दूध और बादाम रखती है।
में अभी छोटा हु,
जमके पढता हु और मन लगाके खेलता हु
ओह सॉरी सॉरी
मन लगाके पढ़ता हु और जमके खेलता हु
माँ, वो कुछ नहीं करती,
बस मुझे बोर्नविटा पिलाती है 
और रात को लोरी गा के सुलाती है।

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